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    29 August

    हम तो हैं परदेस में

     

    ये क्रुति हिन्दी के प्रख्यात रचनाकार राही मासूम रजा की कलम का चमत्कार है, शायद बहोत कम लोगो को पता होगा की उन्हो ने ही बी. आर. चोप्रा की धारावाहिक महाभारत के डाईलोग्स लिखे थे । ये कविता उन लोगो को ज्यादा पसंद आयेगी जो की परदेस मे रहेते हुए दोपहर  की  धूप मे भी अपने देश मे नीकले चांद को याद करते है । यहाँ पर की गई चांद की कीसी आंख के आंसु के कतरे की कल्पना अपने आप मे एक शायरी है । ये कविता आप जगजीत सिंह की सुंदर आवाज मे भी सुन सकते है ।  तो खास तौर पर परदेस मे बसे मेरे दोस्तो के लिये प्रस्तुत है ये रचना.......

     

    हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
    अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चांद

    जिन आँखों में काजल बनकर तैरी काली रात
    उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद

    रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
    आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चांद

    चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
    मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद

    हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
    अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चांद

     

    - राही मासूम रज़ा

     



    26 August

    प्रयाण गीत

     

    ये एक शक्ति दायक प्रयाणगीत है, जब कोई वीर अपना ध्येय हांसिल करने को घर से चलता है तब जो उसका होंसला होता है वो बडा ही अनुपम होता है, तब ना उसे कोई पहाड रोक सकता है ना कोई खाई गिरा सकती है..... उनका होंसला बयान करती हुई कुछ और पंक्तियां याद आती है......


    तूफान और आंधी हमको न रोक पाये,

    वे और थे मुसाफिर जो पथ से लौट आये ।

    मरने के सब ईरादे जिने के काम आये,

    हम भी तो है तुम्हारे कहेने लगे पराये ॥


    यह तो शायद हम सब का अनुभव होगा की जब हमे अपनी सच्चाई पर बहोत ही विश्वास होता है और अगर किसी निर्णय पर अड जाये तो हमे सभी और से धिक्कार सहना पडता है और जब वक्त के चलते हमारा निर्णय ही सही साबित होता है तब वे ही लोग आपके आसपास पूंछ पटपटायेंगे ..... तो कहेने का मतलब ये है की अगर आप के पास दुनिया को देने के लिये कुछ हो तभी आपकी समाज मे कुछ पोझिशन है वरना तो फिर...... कोई आप्को पूछेगा तक नही, आपके अपने भी नही ।

    प्रयाण गीत

    वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

    हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
    ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
    वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

    सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
    तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
    वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

    प्रपात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
    सूर्य से बढ़े चलो चंद्र से बढ़े चलो
    वीर, तुम बढ़े चलो धीर, तुम बढ़े चलो।

    एक ध्वज लिए हुए एक प्रण किए हुए
    मातृ भूमि के लिए पितृ भूमि के लिए
    वीर तुम बढ़े चला! धीर तुम बढ़े चलो!

    अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
    यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
    वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

    - द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी



    વિપત્તિમાં મારી રક્ષા કરો......

     

    કવિવર શ્રી રવિન્દ્ર્નાથ ટાગોર ની કલમે રચાયેલી આ હદ્યસ્પર્શી પ્રાર્થના છે, આ પ્રાર્થના સાંભાળી ને તો કદાચ પ્રભુ ને પણ એમ થઈ જાય કે વાહ ! શું શ્રધ્ધા છે આ જીવ ની ? આ પ્રાર્થના મા કવિ ના મન માં પ્રભુ પ્રત્યે અપાર શ્રધ્ધા ની સાથે સાથે એક ખુમારી પણ છે જે મુસિબત મા પ્રભુ ની પણ સીધી મદદ ની આશા નથી રાખતા, પણ પોતાના જ બળ પર આધાર રાખી ને તરી જવાની એક અનેરી વાત છે ! આખી કવિતા માં  પોતાના બળ પર આધાર રાખ્નાર કવિ અંત મા તો પ્રભુ ને  એ જ પ્રાર્થે છે કે સુખ માં પણ તમને ઓળખી શકુ અને દુખ ની ઘોર અંધારી રાત્રિ માં પણ પ્રભુ પર ની શ્રધ્ધા ડગી ન જાય એમ પ્રાર્થે છે, આ સાંભળી મને હિન્દી ના પ્રખ્યાત કવિ રામનરેશ ત્રિપાઠી ની એક પંક્તિ યાદ આવી જાય છે, दुख में न हार मानूँ, सुख में तुझे न भूलूँ। ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥ મને પાક્કુ તો ખબર નથી પણ કદાચ આ અનુવાદ આપણા શ્રી ઉમાશંકર જોશી એ કરેલો છે..... મને આ ખૂબ જ ગમ્યો તો આપની સમક્ષ મુકુ છુ......

     

    હે પ્રભો !

     

    હે પ્રભો !

    વિપત્તિમાં મારી રક્ષા કરો, એ મારી પ્રાર્થના નથી,

    પણ વિપત્તિમાં હું ભય ન પામું, એ મારી પ્રાર્થના છે.

    દુ:ખ ને સંતાપથી ચિત્ત વ્યથિત થઇ જાય ત્યારે

    મને સાંત્વના ન આપો તો ભલે,

    પણ દુ:ખ પર હું વિજય મેળવી શકું એવું કરજો.

    મને સહાય ન આવી મળે તો કાંઇ નહિ,

    પણ મારું બળ તૂટી ન પડે.

    સંસારમાં મને નુકસાન થાય,

    કેવળ છેતરાવાનું જ મને મળે,

    તો મારા અંતરમાં હું તેને મારી હાનિ ન માનું તેવું કરજો.

    મને તમે ઉગારો - એવી મારી પ્રાર્થના નથી,

    પણ હું તરી શકું એટલું બાહુબળ મને આપજો.

    મારો બોજો હળવો કરી મને ભલે હૈયાધારણ ન આપો,

    પણ એને હું ઊંચકી જઈ શકું એવું કરજો.

    સુખના દિવસોમાં નમ્રભાવે તમારું મુખ હું ઓળખી શકું,

    દુ:ખની રાતે, સમગ્ર ધરા જ્યારે પગ તળેથી ખસી જાય

    ત્યારે તમે તો છો જ -

    એ વાતમાં કદી સંદેહ ન થાય, એવું કરજો.

     


    24 August

    हे प्रभु ! आनंद दाता !!

     

    संत श्री आशाराम बापूजी के प्रवचन मे सुनने में आई हुई ये एक अति सुंदर प्रार्थना है....... जो की शायद आज के युग में हम सभों के लिये बहोत ही जरूरी है । ये आजकल जो भी बाते है वो तो सरकार या न्यायालय फैसला करेंगी की सही है या गलत लेकिन मै तो अपने अनुभव को ही  सच्चा मानता हुं , और मेरा अनुभव ये है की मुझे तो अभी भी उनके प्रवचनों से , वचनों से खूब शांति मीलती है , जीवन जीने की शक्ति मिलती है, मार्गर्शनमिलता है...... तो मेरा सच तो यही है जो मेरा अनुभव है । और फीर अपना आर्षग्रंथ ऋगवेद कहता है की  " आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वा..... " यानिकी सारे विश्व मे से अच्छे अच्छे विचार हमको आ मिले, और फिर कीसी अच्छे विचार को सिर्फ ईसीलिये त्याग देना की वो  कीसी  एक  व्यक्ति का है जो शायद हमको पसंद नही, ये बात भी तो गलत है.......... मुझे तो ये दिमाग की संकुचितता लगती है । तो मुझे तो यह प्रार्थना विश्वशांति की लगी तो मैने रखदी, अब अपना अनुभव आप पर न थोपते हुए आपके अनुभव पर छोडता हुं.......... अगर  आप पूज्य बापूजी के मुख से ईसे सुनना चाहते है वे यहां  क्लिक करें......


    हे प्रभु !आनंद दाता !!

     

    हे प्रभु ! आनंद दाता !! ज्ञान हमको दीजिये |

    शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये ||

    हे प्रभु…


    लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बनें |

    ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें ||

    हे प्रभु…


    निंदा किसीकी हम किसीसे भूल कर भी न करें |

    ईर्ष्या कभी भी हम किसीसे भूल कर भी न करें ||

    हे प्रभु …


    सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें |

    दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें ||

    हे प्रभु …


    जाये हमारी आयु हे प्रभु ! लोक के उपकार में |

    हाथ ड़ालें हम कभी न भूलकर अपकार में ||

    हे प्रभु …


    कीजिये हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा !

    मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा ||

    हे प्रभु …


    प्रेम से हम गुरुजनों की नित्य ही सेवा करें |

    प्रेम से हम संस्कृति की नित्य ही सेवा करें ||

    हे प्रभु…


    योगविद्या ब्रह्मविद्या हो अधिक प्यारी हमें |

    ब्रह्मनिष्ठा प्राप्त करके सर्वहितकारी बनें ||

    हे प्रभु…

     

    The english translation of this beautiful bhajan i found from www.hariomgroup.net, so i thought those who can be more comfortable with english then hindi can find this translation more useful so, i brought this from that website with thanks. 

     

      O Lord, O Giver of Bliss!

     

    O Lord, O Giver of Bliss!

    Bless us with knowledge.

    Deliver us from all vices quickly

    O Lord, O Giver of Bliss…

    Please give us your benign shelter

    So that we become virtuous!

    May we observe Brahmacharya, protect dharma,

    Be heroic and firm in our vows.

    O Lord, O Giver of Bliss…

    May we never utter, even in dream, a slander against anybody.

    May we never be jealous, even in dream of anybody.

    O Lord, O Giver of Bliss…

    May we speak truth, never tell a lie, and develop fraternity,

    May we have life divine, and sing thy praises.

    O Lord, O Giver of Bliss…

    May we spend life doing philanthropic activities,

    May we never indulge in misanthropic activities.

    O Lord, O Giver of Bliss…

    May such be thy grace upon us O Lord!

    May our souls be free from delusion, conceit and jealousy.

    O Lord, O Giver of Bliss…

    May we affectionately serve elders always,

    May we affectionately serve our pious culture.

    O Lord, O Giver of Bliss…

    May we be more inclined towards attaining yoga and self knowledge

    May we attain steadfastness in the Self, and become benevolent to all.

    O Lord, O Giver of Bliss…









    जब घर की चौखट......

    ईस सुंदर कविता को मैने एक पुरानी धारावाहिक ' उपन्यास ' में सुना था , जिसमे ईसको एक क्रांतिकारी कवि के मुख मे रखा गया है मुझे ये बहोत खूब लगी तो आप लोगों के साथ शेअर करने का मन कीया तो यहां रख रहा हुं ...... ये बहुत ही सुंदर धारावहिक थी जो आज भी राजश्री  की वेबसाईट पर देखी जा सकती है...... प्रथम तीन पंक्तियों से प्रभावित होकर मैने इस में अंतिम दो पंक्तियां खुद की तरफ से  मिलाई  है..... आशा है की वो भी आपको पसंद आयेगी........

     

    जब घर की चौखट लांघ चले, तब छांव का बोझा ढोना क्या ?
    जब छोड चले मां की गोदी, तब तकीया और बीछौना क्या ?


    जब अंधियारे का हाथ ग्रहा, तब क्या दीपक और क्या बाती ?
    जब अपने को खुद ही डूबो चूके, तब लूटिया और डूबोना क्या ?


     जो खुद ही मौत बुलाता हो, फिर उसके लिये रोना क्या ?
    जो अंकुर बनकर खुद उगता, उसके लिये बोलो बोना क्या ?


    जो पक्का ईरादा है दिल में , तब मुड के पीछे देखना क्या ?
    जब सबका बनने सबको छोडा, तब अपना पराया रखना क्या ?


    दिल दिलबर का  था  दे दिया, अब उसके लिये पछ्तावा क्या ?
    गर छोडना है कुछ भीतर छोड, यूं बाहर का दीखावा क्या ?












    15 August

    वन्दे मातरम्

     

      

    वन्दे मातरम्
                                  

    वन्दे मातरम्। वन्दे मातरम्॥
    सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
    शस्य श्यामलां मातरंम् .
    शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम
    फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
    सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
    सुखदां वरदां मातरम् ॥

    सप्त कोटि कन्ठ कलकल निनाद कराले
    द्विसप्त कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले
    के बोले मा तुमी अबले
    बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
    रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥

    तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि ह्रदि तुमि मर्म
    त्वं हि प्राणाः शरीरे
    बाहुते तुमि मा शक्ति,
    हृदये तुमि मा भक्ति,
    तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥

    त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
    कमला कमलदल विहारिणी
    वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
    नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
    सुजलां सुफलां मातरम् ॥

    श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
    धरणीं भरणीं मातरम् ॥

    - बंकिमचंद्र चॅटर्जी

     

     

    Mother, I bow to thee!
    Rich with thy hurrying streams,
    bright with orchard gleams,
    Cool with thy winds of delight,
    Dark fields waving Mother of might,
    Mother free.

    Glory of moonlight dreams,
    Over thy branches and lordly streams,
    Clad in thy blossoming trees,
    Mother, giver of ease
    Laughing low and sweet!
    Mother I kiss thy feet,
    Speaker sweet and low!
    Mother, to thee I bow.

    Who hath said thou art weak in thy lands
    When the sword flesh out in the seventy million hands
    And seventy million voices roar
    Thy dreadful name from shore to shore?
    With many strengths who art mighty and stored,
    To thee I call Mother and Lord!
    Though who savest, arise and save!
    To her I cry who ever her foeman drove
    Back from plain and Sea
    And shook herself free.

    Thou art wisdom, thou art law,
    Thou art heart, our soul, our breath
    Though art love divine, the awe
    In our hearts that conquers death.
    Thine the strength that nervs the arm,
    Thine the beauty, thine the charm.
    Every image made divine
    In our temples is but thine.

    Thou art Durga, Lady and Queen,
    With her hands that strike and her
    swords of sheen,
    Thou art Lakshmi lotus-throned,
    And the Muse a hundred-toned,
    Pure and perfect without peer,
    Mother lend thine ear,
    Rich with thy hurrying streams,
    Bright with thy orchard gleems,
    Dark of hue O candid-fair

    In thy soul, with jewelled hair
    And thy glorious smile divine,
    Lovilest of all earthly lands,
    Showering wealth from well-stored hands!
    Mother, mother mine!
    Mother sweet, I bow to thee,
    Mother great and free!

    - Translation by Shree Aurobindo


    07 August

    यह क्यों?

     

      हिन्दी के प्रख्यात कवि दुष्यंत कुमार की ये कविता हम सबको एक सवाल पूछ्ती है, हमारी दुखती नस को दबाया गया है, हर एक सवाल हमको हुछ सोचने पर मजबूर कर देती है । मुझे ये तो पता नही की कवि ये सवालात कीस से कर रहे है पर जरा ये सारे सवाल अपने देश की लोकशाही या फीर अपने माननीय नेताओ से पूछे  जाये तो ??? इस की कुछ पंक्तियां जैसे   की रुक रुककर चलने का अभ्यास, उल्टे उल्टे से चाल-चलन , सिर से पाँवों तक क्षत-विक्षत, पण्डित विद्वानों जैसी बात , लेकिन मूर्खों जैसी हरकत, यह क्यों?   लगता है की किसी नेता को ध्यान मे रखकर ही लिखी गयी होगी.....या फिर लीखी जानी चाहीए थी ।


    हर उभरी नस मलने का अभ्यास
    रुक रुककर चलने का अभ्यास
    छाया में थमने की आदत
    यह क्यों?

    जब देखो दिल में एक जलन
    उल्टे उल्टे से चाल-चलन
    सिर से पाँवों तक क्षत-विक्षत
    यह क्यों?

    जीवन के दर्शन पर दिन-रात
    पण्डित विद्वानों जैसी बात
    लेकिन मूर्खों जैसी हरकत
    यह क्यों?

    - दुष्यंत कुमार

     

    *****






    And miles to go before I sleep.....

     

     

    Stopping By Woods On A Snowy Evening

     

    Whose woods these are I think I know.
    His house is in the village though;

    He will not see me stopping here
    To watch his woods fill up with snow.
    My little horse must think it queer
    To stop without a farmhouse near

    Between the woods and frozen lake
    The darkest evening of the year.
    He gives his harness bells a shake
    To ask if there is some mistake.

    The only other sound's the sweep
    Of easy wind and downy flake.

    The woods are lovely, dark and deep.
    But I have promises to keep,
    And miles to go before I sleep,
    And miles to go before I sleep.

    --Robert Frost

    01 August

    હું મરી ગયો.--રમેશ પારેખ

    આજે આપણે શ્રી રમેશ પારેખ ની એક અજબ રચના જોઈશુ, જેનું શિર્ષક છે હું મરી ગયો, જે ગુજરાતી ભાષા ના કમનસીબે આજે સત્ય હકીકત છે.  પણ, આ કવિતા એક અજબ પ્રયાસ છે મ્રુત્યુ ને આલેખવાનો ! માણસ એક દિવસ ઘરે થી નીકળે છે કંઈક લેવા, કંઈક કામ પતાવા..... પણ એને ખબર જ નથી હોતી કે કઈ ક્ષણે એ કાળ નો મહેમાન બની ને અહીં થી વિદાય થઈ જશે........ સાહિર લુધિયાનવી એ કહ્યું છે ને   ना जाने कौन-सा पल मौत की अमानत हो, हर एक पल की खुशी को गले लगा के जियो...... બસ આવી જ જિંદગી ને મૌત ની સંધિક્ષણે રચાયેલી આ કવિતા છે..... 

    હું મરી ગયો.

    અંતરિયાળ.

    તે શબનું કોણ ?

    તે તો રઝળવા લાગ્યું.

    કૂતરૂં હાથ ચાવી ગયું

    તો સમળી આંતરડાનો લચકો ખેંચી ગ ઇ

    કાગડા મજેથી આંખો ઠોલે

    કાન સોંસરી કીડીઓ આવે-જાય

    સાલું, સાવ રામરાજ ચાલે..

    પવન દુર્ગંધથી ત્રાસીને છૂ

    તે વાળ પણ ન ફરકે

    -ને આ બાજુ સાંજ પડું પડું થાય.

    ઘેર જવાનું તો હતું નહીં.

    આખો રસ્તો પગ પાસે બટકેલો પડ્યો હતો.

    હું સારો માણસ હતો.

    નખમાં ય રોગ નહીં ને મરી ગયો.

    કવિતા લખતો.

    ચશ્માં પહેરતો.

    ઝાડપાન આઘાત લાગવાના દેખાવમાં ઊભાં છે.

    પાછળ ઘર કલ્પાંત કરતું હશે.

    અને એમ સહુ રાબેતાભેર.

    ખરો પ્રેમ માખીનો

    જે હજી મને છોડતી નથી.

    હું બિનવારસી,

    ને જીવ સાલો, જલ્સા કરતો હશે.

    પણ કાકો ફરી અવતરશે.

    ને માણસગીરી કરશે, હી હી હી..

    -આમ વિચારવેડા કરતો હતો

    તેવામાં

    બરોબર છાતી પર જ

    ના, ના ઘડીક તો લાગ્યું કે અડપલું કિરણ હશે.

    પણ નહોતું.

    છાતી પર પતંગિયું બેઠું’તું

    પતંગિયું..

    આલ્લે..

    સડસડાટ રૂંવાડાં ઊભાં..

    લોહી ધડધડાટ વહેવા માંડ્યું

    ઓચિંતી ચીસ નીકળી ગ ઇ કે

    હું મરી ગયો નથી..

    સોનલ, ત્યારે હું ફરી જીવતો થયો હોઇશ.

    -- રમેશ પારેખ


    31 Juli

    THE ROAD NOT TAKEN


    Robert Frost was perhaps the best poet in the current age of English Poetry, this is one of the best of his works and also one of my favourite poems . The last three lines of this poem inspired too many lives through out the world. I like them very much, at almost each and every stage of our life we have two choices and we have to make choice between them. This choice makes the whole difference in our life, although it seems to be a little decision. A one degree of difference makes the difference of miles in the long run in the nautical journey. The same is applicable to our lives, the one choice that we made in the past buuilding our present and our smalll decisions of the present will design oue future !! It is always good to make the choice the road which is less travelled.......our history is the story of the personalities who choose the road less travelled by......


     THE ROAD NOT TAKEN

    Two roads diverged in a yellow wood,
    And sorry I could not travel both

    And be one traveler, long I stood
    And looked down one as far as I could
    To where it bent in the undergrowth;
    Then took the other, as just as fair,

    And having perhaps the better claim,
    Because it was grassy and wanted wear;
    Though as for that the passing there
    Had worn them really about the same,

    And both that morning equally lay
    In leaves no step had trodden black.
    Oh, I kept the first for another day!

    Yet knowing how way leads on to way,
    I doubted if I should ever come back.
    I shall be telling this with a sigh
    Somewhere ages and ages hence:

    Two roads diverged in a wood, and I-
    I took the one less traveled by,
    And that has made all the difference.

    --Robert Frost








    30 Juli

    अन्वेषण

    आज मै आपके पास लेकर आया हुं एक खोज, एक सनातन खोज, जो मनुष्य जाति अपने उद्भव से लेकर अब तक करती चली आई है । ये खोज है उस परमतत्व की जीसे की कुछ लोग परमात्मा कहेंगे, कुछ अलाह, कुछ गोड, कुछ अपनी बुध्धि के मद के दिवाने premordial energy कहेंगे, या कुछ मंसुर जैसे दिवाने उसे अनलहक यानि अपना आपा ही कहेंगे..... पर ईससे उसको क्या फर्क पडेगा ?? वह तो अपने आप में पूर्ण है..... उसे ही उपनिषद " पूर्णमिदं पूर्णमदं.... " कहेता है । उस परमतत्व की खोज में कविहदय कहां- कहां भटका कै ईसको कवि श्रीरामनरेश त्रिपाठी  ने अपने सुंदर अंदाज व शब्दो मे बताया है.......जो अपने आपमें मननीय है । ईस कविता में कवि ने सभी ध्रर्मों व संप्रदायो की एकता का निरुपण बीना किसी उपदेश के भार के किया है..... यहां बहुत सी जगहों पर रुक जाने को मन करता है........ पर सबसे प्रिय जो मुझे है वे ईस काव्य की अंतिम पंक्तियां है जो की हररोज की प्रार्थना का हिस्सा बन सकती है....... दुख में न हार मानूँ, सुख में तुझे न भूलूँ। ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥

     

     

    अन्वेषण 

    मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में।
    तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में॥

    तू 'आह' बन किसी की, मुझको पुकारता था।
    मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में॥

    मेरे लिए खड़ा था, दुखियों के द्वार पर तू।
    मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में॥

    बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू।
    आँखे लगी थी मेरी, तब मान और धन में॥

    बाजे बजाबजा कर, मैं था तुझे रिझाता।
    तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में॥

    मैं था विरक्त तुझसे, जग की अनित्यता पर।
    उत्थान भर रहा था, तब तू किसी पतन में॥

    बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था।
    मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में॥

    तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं।
    तू कर्म में मगन था, मैं व्यस्त था कथन में॥

    तेरा पता सिकंदर को, मैं समझ रहा था।
    पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में॥

    क्रीसस की 'हाय' में था, करता विनोद तू ही।
    तू अंत में हंसा था, महमुद के रुदन में॥

    प्रहलाद जानता था, तेरा सही ठिकाना।
    तू ही मचल रहा था, मंसूर की रटन में॥

    आखिर चमक पड़ा तू गाँधी की हड्डियों में।
    मैं था तुझे समझता, सुहराब पीले तन में।

    कैसे तुझे मिलूँगा, जब भेद इस कदर है।
    हैरान होके भगवन, आया हूँ मैं सरन में॥

    तू रूप कै किरन में सौंदर्य है सुमन में।
    तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में॥

    तू ज्ञान हिन्दुओं में, ईमान मुस्लिमों में।
    तू प्रेम क्रिश्चियन में, तू सत्य है सुजन में॥

    हे दीनबंधु ऐसी, प्रतिभा प्रदान कर तू।
    देखूँ तुझे दृगों में, मन में तथा वचन में॥

    कठिनाइयों दुखों का, इतिहास ही सुयश है।
    मुझको समर्थ कर तू, बस कष्ट के सहन में॥

    दुख में न हार मानूँ, सुख में तुझे न भूलूँ।
    ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥

    - रामनरेश त्रिपाठी







    રસ્તો નહીં જડે તો ......



    ગુજરાતી સાહિત્ય ના મૂર્ધન્ય કવિ શ્રી અમ્રૂત ઘાયલ તેમની આ પ્રખ્યાત ગઝલ માં પોતાની રોજિંદી જિંદગી માં આવેલી સમસ્યાઓ વચ્ચે ફસાયેલા મનુષ્યો ની ખુમારી ના દર્શન કરાવે છે. એને બન્યો બનાવ્યો રસ્તો નહી મળે તો એ પોતે પોતાનો રસ્તો બનાવી લેવાની ફાંકડી વાત છે, કવિ મુંઝાઈ ને મરી જવાની એટ્લે કે પરિસ્થિતિ નીચે કચડાઈ મરવાની સાફ ના પાડે છે. એના માટે એનુ આત્મબળ જ દરેક દર્દ ની દવા છે, એ બુધ્ધ ના મિજાજ માં કહે છે સ્વયં પ્રકાશ છીએ (આત્મ દિપો ભવ :), એ કોઈ બીજા પ્રકાશ સ્ત્રોત નો સહારો લેવાની પણ ના પાડે છે !! પરંતુ આ બધા છતાં પણ અંતે તો એમના પગ તો જમીન પર જ છે,
    છેલ્લે તેઓ સર્વસમર્થ, સર્વનિયંતા પ્રભુ નુ શરણું સ્વીકારી ને કહે છે, "ઈશ્વર સમો ધણી છે, થોડા મરી જવાના ?".......... અને કદાચ એટલે જ મને આ કવિતા ખૂબ પસંદ છે !!!


    રસ્તો નહીં જડે તો રસ્તો કરી જવાના,
    થોડા અમે મુંઝાઇ મનમાં, મરી જવાના !

    કોણે કહ્યું કે ખાલી હાથે મરી જવાના ?
    દુનિયાથી દિલના ચારે છેડા ભરી જવાના.

    એક આત્મબળ અમારું દુ:ખ માત્રની દવા છે.
    હર ઝખ્મને નજરથી ટાંકા ભરી જવાના.

    સમજો છો શું અમોને, સ્વયં પ્રકાશ છીએ !
    દીપક નથી અમે કે ઠાર્યા ઠરી જવાના.

    અય કાળ, કંઇ નથી ભય, તું થાય તે કરી લે
    ઇશ્વર સમો ધણી છે, થોડા મરી જવાના ?

    - ધાયલ

    *****





    રોકો !!

     

    શ્રી આદિલ મંસુરી ની કલમે લખાયેલી આ એક કવિતા છે જે આજ ની પરિસ્થિતી નુ તાદ્રશ દ્રશ્ય પુરુ પાડે છે. આ એક આક્રાંત કવિ હદય ની એક સામાન્ય ભારતીય ને અપીલ છે....... રોકો !!! પણ એમ લાગે છે કે આ બધી પરિસ્થિતિ આપણને કોઠે પડી ગઈ છે, આપણને આ બધુ અન્યાય, અત્યાચાર, કોમી દંગલો, બળતા શહેરો, બધુ આપણા ફેમિલી મેમ્બર જેવુ લાગવા લાગ્યુ છે. આપણી સંવેદનશીલતા બુઠ્ઠી થઈ ગઈ છે. એક ઉદાહરણ આપુ તો હમણા તાજેતર માં સુરત માં મળેલા બોમ્બ ના સમાચાર વાંચી ને મારા કાકા એ એમના એક મિત્ર ને ખબર અંતર પૂછવા ફોન કર્યો તો જે જવાબ મળ્યો તે સામાન્ય માણસ ની માનસિકતા ના દર્શન કરાવે છે. એમણે જવાબ આપ્યો કે " જવાદો ને યાર, એકેય ફૂટ્યો જ નહી ને મજા ના આવી, થોડા ફૂટ્યા હોત તો મજા આવી જાત !!! " એમને કોણ સમજાવે કે ભાઈ, મજા આવે ખાલી એને જ કે જેને ઘર માં બેઠા બેઠા સમાચાર જોવા છે, કદી એને પૂછ્યુ છે એ માં ને કે જેનો એક નો એક લાડકવાયો એમા હોમાઈ ગયો છે ?? પણ લોકો ને હવે તમાશો જોવા મા જ મજા આવે છે........ છ્તા પણ કવિ હદય ખૂબ આશાવાદી હોય છે..... જે એ જ ઠુંઠા ઓ ને સીંચ્યે રાખે છે કે ક્યરેક ને ક્યરેક તો કદાચ એમાં અંકુર ફૂટી જાય.......  

     

    લોહીની નદીઓ વહે છે રોકો
    રોજ નિર્દોષ મરે છે રોકો

    આગને કોણ સળગતી રાખે
    શહેરના શે’ર બળે છે રોકો

    ન્યાય ને રક્ષા કરી જે ન શકે
    ભાષણો કેમ કરે છે રોકો

    શબની પેટીથી મતની પેટી
    કોઈ સરખાવ્યા કરે છે રોકો

    છે ઈમારત પડું પડું ‘આદિલ’
    મૂળ આધાર ખસે છે રોકો

    - આદિલ મન્સૂરી

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    27 Juli

    શ્રધ્ધાંજલી ......

    આજે અમદાવાદ માં કેટલાક ત્રાસવાદી તત્વો ના હિચકારા ક્રુત્ય ના પરિણામે વરતાયેલા કાળા કેર ને જોતા ઘણી વાર લાગે છે કે હવે સમય આવી ગયો છે ઉભા રહી જવાનો, શાંતિ થી વિચારવાનો, થોડુ આત્મપરિક્ષણ કરી લેવાંનો. આપણે ક્યાં જઈ રહ્યા છીએ, કઈ તરફ જઈ રહ્યા છીએ, કેવી રીતે જઈ રહ્યા છીએ? અને જ્યાં જઈ રહ્યા છીએ ત્યાં એકલા તો નથી જઈ રહ્યા ને..... સમાજ ના કોઈ મોટા વર્ગ ને તો આપણે ભૂલી નથી રહ્યા ને? જે લોકો આ બધુ કરી રહ્યા છે તેઓ પણ ક્યારેક ને ક્યારેક તો આપણા જ માં ના એક હતા. તો પછી કેમ આજે તેઓ પોતાના જ મૂળીયા ઉખાડવા ને તૈયાર થયા છે?? ક્યાંક ને ક્યાંક કોઈ કડી ખૂટે છે......એ તો ભગવાન જ જાણે પણ વિચાર્યા વગર ના એક કામ થી કેટલા નિર્દોષો ને સહન કરવુ પડે છે એ જ મને તો દેખાય છે. આવા જ લોકો માટે બીજુ તો કાંઈ જ ન કરી શકતા.... જેઓ વિચારી શકે છે તેઓ માટે ઈસ્ત્રાઈલી કવિ ની આવા જ કોઈ પ્રસંગે નીકળેલી મનોવ્યથા તમારી સમક્ષ રજૂ કરુ છુ....... એ જ પ્રાર્થના સાથે કે ભગવાન મ્રુતકો ના આત્મા ને શાંતિ આપે અને પેલા ગુમરાહ ભાઈ ઓ ને સદબુધ્ધિ આપે...... અસ્તુ.



    બૉમ્બનો વ્યાસ ત્રીસ સેન્ટિમીટર હતો
    અને એની વિનાશશક્તિના વર્તુલનો વ્યાસ સાત મીટર હતો.
    અને એ મર્યાદાવર્તુલમાં પડ્યા હતા ચાર મરેલા અને અગિયાર ઘવાયેલા
    અને એમની આજુબાજુ વેદના અને સમયના વધુ વિસ્તરેલા વર્તુલમાં
    વેરવિખેર ઊભાં છે બે દવાખાનાં અને એક કબ્રસ્તાન.
    પણ સો કરતાં વધુ કિલોમીટર દૂરની ભૂમિમાંથી
    આવેલી સ્ત્રીને જ્યાં ભૂમિદાહ કર્યો તે બિન્દુ
    વર્તુલને ખૂબ વિસ્તારી દે છે.
    અને તેના મૃત્યુ પર આંસુ સારતા એકાકી માનવીનું બિન્દુ
    દૂરના પ્રદેશના એક દૂરના ખૂણામાં
    સમસ્ત વિશ્વને વર્તુલમાં સમાવી લે છે.
    અને હું ચૂપ જ રહીશ અનાથ બાળકોનાં આંસુ વિશે
    કે જે ઈશ્વરના સિંહાસન સુધી પહોંચે છે
    અને ત્યાંથી એ વધુ વિસ્તરી
    વર્તુલને અનંત અને ઈશ્વરવિહોણું બનાવે છે.

    -યેહુદા અમિચાઈ (ઈઝરાઈલ)
    અનુ.: ઇન્દ્રજીત મોગલ


    આ જ મોકા પર  ફિલ્મ 1947- અર્થ નું જાવેદ અખ્તર રચિત ઇશ્વર કે અલ્લાહ ને ફરિયાદ કરતુ એક સુંદર ગીત બે ઘડી વિચારતા કરી મુકે એવા વિડીયો ક્લિપિંગ્સ સાથે જોવા માટે અહીં ક્લિક કરો...... આ જ ગીત તેના લિરિક્સ સાથે જોવુને સાંભળવુ હોય તો અહીં ક્લિક કરો......


        


    24 Juli

    एक मुक्तक......


    सांप !

    तुम सभ्य तो हुए नहीं

    नगर में बसना

    भी तुम्हे नही आया !

    एक बात पूछूं --

    उत्तर दोगे??

    तब कैसे सीखा डसना

    विष कहां पाया??  

    - अज्ञेय











    13 Juli

    Beautiful song of Rabindra Nath Tagore....

          
                 I found this poem of Ravibabu very interesting and inspiring......thats why i want to share my experience with you guys....i think this is the day to day experience of the people of today that is you and me......i think we all are experiencing the same hardness in our hearts daily.....everyday the grace is lost  from our life....so, we are in the very need of the grace of God and shower of mercy either in the form of burst of song or in the form of silence, peace and rest.....now let me stop interfering between you and the poet and let you experience the serenity within it.......

    When the heart is hard and parched up,
    come upon me
    with a shower of mercy.


    When grace is lost from life,
    come with a burst of song.

    When tumultuous work raises ,
    its din on all sides shutting
    me out from beyond, come to me,
    my lord of silence,
    with thy peace and rest..


    When my beggarly heart sits crouched,
    shut up in a corner,break open the door,
    my kind, and come with the ceremony of a king.


    When desire blinds the mind with delusion and dust,
    O thou holy one, thou wakeful, come with thy light and thy thunder.


    - Rabindranath Tagore ( Gitanjali, No.39)










    09 Juli

    MY FAVORITE POEM........IN GUJARATI....

    HI, GUYS THIS IS THE FIRST ENTRY OF MINE SO I'D LIKE TO BRING THE MOST FAMOUS POEM IN GUJARATI TO U.....WHICH IS THE PRAYER ALSO......WHICH  I LIKE THE MOST.....IT IS....
     

     

    પ્રભો અંતર્યામી જીવન જીવના દીનશરણા,
    પિતા માતા બંધુ, અનુપમ સખા હિતકરણા;
    પ્રભા કીર્તિ કાંતિ, ધન વિભવ સર્વસ્વ જનના,
    નમું છું, વંદું છું, વિમળમુખ સ્વામી જગતના. 1

    સૌ અદભૂતોમાં તુજ સ્વરૂપ અદભૂત નીરખું,
    મહા જ્યોતિ જેવું નયન શશીને સૂર્ય સરખું,
    દિશાઓ ગુફાઓ પૃથ્વી ઊંડું આકાશ ભરતો,
    પ્રભો એ સૌથીએ પર પરમ હું દૂર ઊડતો. 2

    પ્રભો તું આદિ છે શુચિ પુરૂષ પુરાણ તું જ છે,
    તું સૃષ્ટિ ધારે છે, સૃજન પલટયે નાથ તું જ છે,
    અમારા ધર્મોને અહર્નિશ ગોપાલ તું જ છે,
    અપાપી પાપીનું શિવ સદન કલ્યાણ તું જ છે. 3

    પિતા છે અકાકિ જડ સકળને ચેતન તણો,
    ગુરૂ છે મોટો છે જનકૂળ તણો પૂજ્ય તું ઘણો,
    ત્રણે લોકે દેવા નથી તું જે સમો અન્ય ન થશે,
    વિભુરાયા તુંથી અધિક પછી તો કોણ જ હશે. 4

    વસે બ્રહ્માંડોમાં, અમ ઉર વિષે વાસ વસતો,
    તું આઘેમાં આઘે, પણ સમીપમાં નિત્ય હસતો,
    નમું આત્મા ઢાળી, નમન લળતી દેહ નમજો,
    નમું કોટિ વારે, વળી પ્રભુ નમસ્કાર જ હજો. 5

    અસત્યો માંહેથી પ્રભુ ! પરમ સત્યે તું લઈ જા,
    ઊંડા અંધારેથી, પ્રભુ ! પરમ તેજે તું લઈ જા;
    મહામૃત્યુમાંથી, અમૃત સમીપે નાથ ! લઈ જા,
    તું-હીણો હું છું તો તુજ દરશનાં દાન દઈ જા. 6

    પિતા ! પેલો આઘે, જગત વીંટતો સાગર રહે,
    અને વેગે પાણી સકળ નદીનાં તે ગમ વહે;
    વહો એવી નિત્યે મુજ જીવનની સર્વ ઝરણી,
    દયાના પુણ્યોના, તુજ પ્રભુ ! મહાસાગર ભણી. 7

    થતું જે કાયાથી, ઘડીક ઘડી વાણીથી ઊચરું,
    કૃતિ ઇંદ્રિયોની, મુજ મન વિશે ભાવ જ સ્મરું;
    સ્વભાવે બુદ્ધિથી, શુભ-અશુભ જે કાંઈક કરું,
    ક્ષમાદષ્ટે જોજો, - તુજ ચરણમાં નાથજી ! ધરું. 8

    (courtesy: TAHUKO.COM)


                 What??? Try to recall where you heard it??? let me help.....in school prayer......got it????  SO, here you got the whole prayer again after many years may be......but now take it seriously(!!).........Its very powerful prayer it  leads us to the deeper level of our consciousness, it connects the limited human consciousness to the highest of all super consciousness.....you can read and re read it but it never get out of feeling.....one can feel the heal of the omnipotent GOD within himself while reciting the prayer. Actually this prayer is the gujarati translation of the ancient sanskrit verses of the Upnishadas which was brilliantly translated by the renowned poet Kavi Nanhalal.......anyway still it's as fresh as it was written today...so try to feel this.....and if  you want to listen some of its part then click this link........http://tahuko.com/?p=375